इन शहरों में बड़े पारंपरिक अंदाज से 3 दिनों तक मनाई जाती है महाशिवरात्रि

सिरमौर(गोपाल): राजगढ़ सिरमौर में वह रात्रि जिस का शिव के साथ घनिष्ठ सबंध हौ उसे शिवरात्रि की संज्ञा दी गई है। ऐसा हमारे शास्त्रों मे वर्णन मिलता है। ऐसा कहा गया है कि फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष को हमारे देश मे शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है और इस रात्रि के चारों प्रहर में भगवान शिव की अलग-अलग शास्त्रोक्त विधियों से पूजा की जाती है। शिव मंदिरों में जागरण व भजन कीर्तन होता है। लोग दिनभर शिव मंदिरों मे जाकर शिवलिगं का जलाभिषेक करते है। देश के अलग-अलग भागों मे अलग-अलग तरीके से यह शिव पर्व मनाया जाता है। यहा शिमला ,सोलन ,सिरमौर के ग्रामीण क्षैत्रों यह पर्व आज के आधुनिक समय मे भी बड़े पारंपरिक अंदाज से तीन दिनों तक मनाया जाता है। इन तीनो दिनों को अलग अलग नामों से पुकारा जाता है।

शिवरात्रि के लिए बनने वाले पकवानों का सिलसिला आरंभ
शिवरात्रि से पहले वाले दिन को ददणो ,शिवरात्रि वाले दिन को पडेई तथा शिवरात्रि से एक दिन बाद को बासी कहा जाता है। ददोण वाले दिन रात्रि भोजन मे पारंपरिक पहाड़ी व्यजन सिडकू ,पटाडे ,अस्कली ,लुश्के आदि बनाये जाते है इसके पीछे इसी धारणा है कि शिव पर्व के आने की खुशी मे घर मे अच्छा भोजन बनना चाहिए शिवरात्रि वाले दिन सुबह से ही घरों मे शिवरात्रि के लिए बनने वाले पकवानों का सिलसिला आरंभ हो जाता है जो पकवान विशेष रूप से बनाए जाते है। उसके तेल मे पकने वाले मीठे व नमकीन पकैन ,मालपूडे ,उडद के आटे से बने माशडू और विशैष रूप से जिन का शिव परिवा को पूजा के समय भोग लगाया जाता है। तीन आटे के बड़े-बड़े रोट व आटे के बकरे शामिल है। संध्या के समर शिव पार्वती की मिटटी की व गणेश की गोबर की मूर्ती बनाई जाती है। फिर इन मूर्तियों को पूजा मंडप पर रख कर इस के उपर परिजात जिसे स्थानीय भाषा मे पाजा कहा जाता है के पतो का छत्र जिसे स्थानीय भाषा मे चंदुआ कहा जाता है।

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